कनक तिवारी का संविधान निर्माण में चिंतन% एक ऐतिहासिक तथा
वैचारिक दृष्टि
प्रदीप शुक्ल1] सरस कुमार ध्रुव2
1प्रोफेसर इतिहास विभाग] गुरु घासीदास विष्वविद्यालय बिलासपुर।
2शोधार्थी इतिहास विभाग] गुरु घासीदास विष्वविद्यालय बिलासपुर।
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
यह शोध पत्र भारतीय संविधान निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया को एक वैचारिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है, जिसमें कनक तिवारी जैसे प्रख्यात विधिवेत्ता, लेखक एवं चिंतक के संवैधानिक विचारों का विश्लेषण किया गया है। भारतीय संविधान न केवल एक विधिक दस्तावेज है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक मूल्यों का संवाहक भी है। संविधान निर्माण की प्रक्रिया 1857 की क्रांति के बाद उपजे सामाजिक-राजनीतिक चेतना से प्रारंभ होकर संविधान सभा की स्थापना एवं संविधान के अंगीकरण तक एक निरंतर संघर्ष और वैचारिक मंथन की परिणति है। इस क्रम में मोतीलाल नेहरू, डॉ. अंबेडकर, नेहरू, गांधी जैसे विचारकों के योगदान के साथ-साथ कनक तिवारी का चिंतन भी महत्वपूर्ण बन जाता है। कनक तिवारी संविधान को ‘राजपथ से जनपथ’ की दिशा में ले जाने की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनके विचारों में संविधान को केवल शासकीय नियंत्रण का साधन नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, आदिवासी अधिकारों, मानवाधिकार, और लोकतांत्रिक चेतना का संवाहक माना गया है। उन्होंने संविधान को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उपलब्धि और सामाजिक बदलाव का माध्यम बताया है। शोध में यह भी विश्लेषण किया गया है कि तिवारी का चिंतन गांधीवादी समाजवाद, नेहरूवादी लोकतंत्र और अंबेडकरवादी न्याय व्यवस्था के समन्वय को प्रतिबिंबित करता है। उन्होंने समकालीन संवैधानिक संकटों पर खुलकर आलोचना की है और संविधान की आत्मा को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया है।
KEYWORDS: भारतीय संविधान, वैचारिक मंथन, मानवाधिकार, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, समाजवाद
प्रस्तावना:-
संविधान किसी भी राष्ट्र का आधारभूत दस्तावेज होता है जो उसकी सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक संरचना को परिभाषित करता हैं। ऐतिहासिक दृष्टिकोण में संविधान निर्माण एक सतत प्रक्रिया है जिसकी नीव 1857 की क्रांति के पश्चात विद्रोही गतिविधियों को नियंत्रित करने के कारण अनेक अधिनियमों से जुड़ी हुई है। 1858 में ब्रिटेन की सरकार द्वारा प्रत्यक्ष शासन चलाने के लिए भारत के शासन का पहला कानून भारत शासन अधिनियम बनाया गया था फलस्वरुप अनेक अधिनियम जिसमे व्यवहार प्रक्रिया संहिता 1859, परिसीमा अधिनियम 1859, भारतीय दंड विधान 1860, दंड प्रक्रिया संहिता 1861, उच्च न्यायालय अधिनियम 1861, उत्तराधिकार अधिनियम 1865 तथा संविदा अधिनियम 1872 पारित हुए परंतु भारतीयों के व्यक्तिगत कानून के संबंध में कोई अधिनियम नहीं लागू किया गया था।
संविधान किसी भी देश की शासन व्यवस्था की आधारशिला होता है। यह न केवल नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को परिभाषित करता है, बल्कि शासन की संरचना, शक्तियों और कार्यप्रणाली का भी निर्धारण करता है। भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जो विविधताओं से भरे इस देश को एकसूत्र में बांधने का कार्य करता है। इसकी रचना एक अत्यंत विचारशील, समर्पित और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का परिणाम थी।
भारतीय संविधान निर्माण की प्रक्रिया 1946 में संविधान सभा के गठन के साथ आरंभ हुई। यह सभा विभिन्न क्षेत्रों, धर्मों, भाषाओं और वर्गों के प्रतिनिधियों का समुच्चय थी, जो देश की भावनाओं और आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करती थी। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर थे, जिनका योगदान इस ऐतिहासिक दस्तावेज की रचना में अमूल्य रहा है।
संविधान निर्माण के पीछे मुख्य उद्देश्य था एक ऐसा ढांचा तैयार करना जो स्वतंत्र भारत को एक समतामूलक, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणराज्य के रूप में स्थापित कर सके। इसके अंतर्गत सभी नागरिकों को समान अधिकार, स्वतंत्रता, न्याय और अवसर प्रदान किए गए। इसमें मूल अधिकारों की व्यवस्था की गई, जो प्रत्येक व्यक्ति को गरिमामय जीवन जीने का आधार देते हैं। साथ ही, इसमें राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों को शामिल किया गया जो सरकार को सामाजिक-आर्थिक न्याय की दिशा में कार्य करने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
संविधान निर्माण प्रक्रिया में व्यापक बहस, विचार-विमर्श और सुझावों का आदान-प्रदान हुआ। संविधान सभा में कुल 11 सत्र हुए और लगभग तीन वर्षों (9 दिसंबर 1946 से 26 नवंबर 1949 तक) में यह ऐतिहासिक कार्य पूर्ण हुआ। 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकृत किया गया और 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया, जो आज ‘गणतंत्र दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
भारत का संविधान न केवल विधिक दस्तावेज है, बल्कि यह भारतीय समाज की आकांक्षाओं, मूल्यों और आदर्शों का प्रतीक भी है। इसकी विशेषता यह है कि यह समय और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तनीय है, जिससे यह देश की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढाल सकता है। भारतीय संविधान के निर्माण में विभिन्न विधिवेत्ताओ विचार को और चिंतकों का योगदान रहा है जिसमें बाल गंगाधर तिलक के प्रयास से शुरू होकर भारतीय परिषद अधिनियम 1909, 1919 थे। कॉमनवेल्थ ऑफ़ इंडिया विधयक 1919, साइमन कमीशन, नेहरू रिपोर्ट, गांधी इरविन समझौता 1929, गोलमेज परिषद, भारत शासन अधिनियम 1935, सर स्टेफोर्ड क्रिप्स के प्रयास कैबिनेट मिशन योजना तक संपूर्ण कोशिशें के परिणाम स्वरूप संविधान निर्माण हेतु संविधान सभा का गठन जुलाई 1946 में हुई।
इसी संदर्भ में कनक तिवारी का संवैधानिक चिंतन एवं शोध भारतीय संविधान की प्रारंभिक उपज विशेष रूप से अनेक संघर्षों एवं योगदानों की क्रमिक विकास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कनक तिवारी का संवैधानिक चिंतन केवल वर्तमान समस्याओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका आधार भारतीय इतिहास और परंपराओं में निहित है। वह संविधान निर्माण प्रक्रिया को भारत के स्वतंत्रता संग्राम और 1857 की क्रांति से जोड़ते हुए इस ऐतिहासिक संघर्षों का परिणाम मानते हैं।
कनक तिवारी का परिचय:
कनक तिवारी छत्तीसगढ़ के एक प्रख्यात विधिवेत्ता पूर्व महाधिवक्ता लेखक विचारक राजनीतिज्ञ पत्रकार एवं प्राध्यापक रहे हैं। जिन्होंने पंडित रवि शंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से एलएलबी में स्वर्ण पदक हासिल कर परीक्षा उत्तीर्ण की कनक तिवारी ने अधिवक्ता के रूप में सलवा-जुडूम केस, समाज सेवक शंकर गुहा नियोगी जमानत, खाद्य नीति तथा मानव अधिकार एवं सामाजिक न्याय आदि महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी अहम योगदान दिया।
पूर्व में मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री छत्तीसगढ़ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्यकारी अध्यक्ष एवं मध्य प्रदेश गृह निर्माण मंडल के अध्यक्ष के रूप में सामाजिक योगदान एवं सेवा देते रहे हैं। प्राध्यापक के रूप में 8 9 वर्षों तक अध्यापन कार्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में संपादकीय लेखन कार्य जिसमें देश एवं राज्यों के समस्याओं को रेखांकित किया। लेखक के रूप में सामयिक घटनाओं पर अनेक पुस्तकों, लेखो के माध्यम से मानव अधिकार जनजाति विश्लेषण एवं संवैधानिक विचार जैसे विषयों पर पुस्तक प्रकाशित किये। संविधान विश्लेषक एवं शोधकर्ता के रूप में छत्तीसगढ़ के एकमात्र लेखक जिन्होंने संविधान विषय पर 6 पुस्तकों में लेखन कार्य करके प्रकाशित किया जिनमे हैं संविधान का सच 2002 आधार प्रकाशन, संविधान का सच 2006 मेधा बुक्स दिल्ली, संविधान की पड़ताल 2015 वाणी प्रकाशन दिल्ली, संविधान और हम भारत के लोग 2021 सूर्य प्रकाशन बीकानेर, संविधान की हालत 2024 प्रलेख प्रकाशन, संविधान एक शिनाख्त सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन 2024।
संविधान निर्माण प्रक्रिया की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
वैश्विक दृष्टिकोण से भारत का संविधान एकमात्र ऐसा संविधान है जिसका निर्माण प्रक्रिया दिसंबर 1946 से आधे समय अंग्रेजों के अधीन एवं शेष संविधान आजादी के बाद 26 नवंबर 1949 में बना। भारत की संविधान को रचना की कथा की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक के निर्देशन में तैयार स्वराज विधेयक 1895 से समझी जाती है। स्वराज विधेयक के आमुख में उल्लेखित है कि स्वराज विधेयक का उद्देश्य ब्रिटिश हुकूमत से भारतवासियों के लिए कुछ नागरिक अधिकार पा लेना है। विधयक की ड्राफ्ट रचना में तिलक ने ब्राजील व अमेरिका के संविधानों से मदद ली थी उसके बाद दो दशक तक कोई महत्वपूर्ण गतिविधि या प्रगति इस दिशा में नहीं हुई। इसी बीच ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका को ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत डोमिनियन स्टेट दिए जाने की घटनाओं की वजह से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भी संवैधानिक आजादी का सपना बना। 1906 में कांग्रेस के इतिहास में उसके अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी ने सबसे पहले स्वराज शब्द का उल्लेख किया लेकिन उसे सीमित आजादी के दायरे में ही परिभाषित किया।
1907 की सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का नरम दल और गरम दल के बीच विभाजन मूलतः संवैधानिक आजादी के सपने को लेकर ही हुआ। गोपाल कृष्ण गोखले के नेतृत्व में कांग्रेस के नए संविधान में ब्रिटिश साम्राज्य के तहत दूसरे गुलाम मुल्कों के बराबर सीमित आजादी पाने का सपना ही बन गया था। तत्कालीन भारत सचिव मोरले और वायसराय मिन्टो ने जो सुझाव दिए उसमें भी भारतीयों की सहभागिता महज उपस्थिति के लिए थी। इन सुधारो को भारतीय परिषद अधिनियम 1909 में शामिल किया गया। पहली बार मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक प्रतिनिधित्व का उपबंध किया गया ऐसा नहीं है कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग शुरू से ही और पूरी तरह प्रतिद्वंदी संगठन थे। कांग्रेस और लीग ने कई मौके पर अलग-अलग और एक साथ मिलकर स्वराज की भावना का लगातार समर्थन किया। 1913 में मुस्लिम लीग ने अपने लखनऊ जलसे में स्वराज के विचार का औपचारिक समर्थन किया है।
प्रथम विष्व युद्ध छिड़ने के कुछ महीने बाद गोपाल कृष्ण गोखले ने युद्धोत्तर सुधारो के नाम पर एक दस्तावेज रचा था। इस दस्तावेजों में भी संभावित संविधान रचना के संकेत निहित थे यह दस्तावेज गोखले रचित पॉलिटिकल टेस्टामेंट के रूप में मशहूर हुआ। प्रथम विश्व युद्ध 1914 1919 में पहली बार भारत को वह मनोवैज्ञानिक संसार और अवसर दिया। जिसका लाभ एनी बेसेंट और तिलक जैसे नेताओं ने होमरूल आंदोलन का विस्तार करके लिया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों संस्थाओं ने मिलकर एक योजना बनाई जिसे दोनों ने दिसंबर 1916 में अपने-अपने अधिवेशन में लखनऊ में मंजूरी दी। यह योजना कांग्रेस लीग योजना के नाम से प्रसिद्ध हुई। 1916 में इंपीरियल लेजिस्लेटिव कॉउंसिल केंद्रीय धारा सभा के 19 सदस्यों ने वायसराय को स्वशासन की परिकल्पना का एक स्मरण पत्र भेजा। 1916 में कांग्रेस के मंच से जिन्ना ने राष्ट्रीय हित में कांग्रेस के साथ जुड़कर काम करने के लिए मुस्लिम लीग का आह्वान किया।
भारत के संवैधानिक विकास में इसके बाद मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन का महत्वपूर्ण स्थान है। इसके कारण ही आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम 1919 रचा गया। कांग्रेस के बाहर तेज बहादुर सप्रू और एनी बेसेंट ने मिलकर दी कॉमनवेल्थ आफ इंडिया विधयक 1919 तैयार किया। एनी बेसेंट ने कहा कि भारत अपने लिए वेस्टमिंस्टर में बैठकर संविधान रचना की इजाजत नहीं दे सकता।
भारतीय राजनीति और संवैधानिक इतिहास में अनुकूल समय तब आया। जब तिलक और गोखले के अवसान के बाद कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन की नकेल गांधी के हाथों में आई। गैर कांग्रेसी प्रयासों पर कड़ी नजर रखते हुए गांधी ने 5 जनवरी 1922 के यंग इंडिया में इंडिपेंडेंस के अपने लेख में संविधान की वह संकेतिक स्वाभिमानी और समग्र परिभाषा की। जिसकी बुनियाद पर ही भारत का संविधान अंततः नियति के हाथों लिखा जाने को था।
गांधी ने साफ कहा संविधान का अर्थ बेशक इच्छा अनुसार आजादी घोषित कर पाने की भारत की काबिलियत से है स्वराज इसलिए ब्रिटिश संसद के तोहफे के रूप में कुबूल नहीं होगा। 1919 से ही देश में आम सहमति थी कि भारतीय अपना संविधान खुद रचेंगे। वीएस राधा स्वामी शास्त्री ने फरवरी 1922 में सुझाव दिया कि संविधान लिखने के लिए हमें अपना सम्मेलन बुला लेना चाहिए। जनवरी 1925 में दिल्ली में महात्मा गांधी की अध्यक्षता में सभा में कॉमनवेल्थ आफ इंडिया विधयक पर विचार किया गया। विधेयक को अप्रैल 1925 के अधिवेशन में स्वीकृत किया गया इस विधेयक में भारतीयों को मिलने वाले मूल अधिकारों का ब्यौरा दिया गया था। जून 1925 में इस विधेयक को ब्रिटिश सरकार को भेज दिया गया उसके साथ देश के 43 महत्वपूर्ण नेताओं का स्मरण पत्र भी संलग्न था।
15 से 18 मई 1927 तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की मुंबई बैठक में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि कांग्रेस कार्य समिति केंद्रित तथा प्रांतीय विधायकों के सहयोग से स्वराज संविधान की रचना करें। कांग्रेस ने पुष्टि की की मार्च 1928 के पहले ऐसे संविधान का प्रारूप बनाकर उसे विशेष अधिवेशन में विचरण के लिए पेश करे। इस सिलसिले में गठित मोतीलाल नेहरू कमेटी ने 19 मूल अधिकार सुझाए थे इन अधिकारों को आयरलैंड के संविधान से ज्यादातर लिया गया था क्योंकि मोतीलाल नेहरू की दृष्टि में मूलभूत अधिकारों को लेकर भारत और आयरलैंड की स्थिति लगभग एक जैसी थी।
साइमन कमीशन भेजने की घोषणा करते हुए ब्रिटिश की संसद ने 24 नवंबर 1927 को भारत के राज्य-सचिव बरकेनहेड ने भारतीय नेताओं को चुनौती के स्वर में कहा वह भारत की महान जनता की व्यापक सहमति वाला एक संविधान रच कर तो दिखा दे। कांग्रेस ने स्वराज संविधान लिखने के लिए बैठक का आह्वान किया उसमें मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, खिलाफत कमेटी जैसे संगठनों के प्रतिनिधि फरवरी 1928 में दिल्ली में उपस्थित हुए। दूसरी बैठक में 1928 मुंबई में हुई जिसमें मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित उप समिति ने अली इमाम, तेज बहादुर सप्रू, एम एस अण,े सरदार मंगल सिंह, शोएब कुरैशी, सुभाष चंद्र बोस और जी आर प्रधान को रखा गया। 10 अगस्त 1928 को प्रस्तुत रिपोर्ट संवैधानिक इतिहास में नेहरू रिपोर्ट के नाम से जाना गया। इसके पश्चात गांधी इरविन समझौता हुआ इसके अनुसार इन्हें सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लेने तथा दूसरे गोलमेज सम्मेलन के तहत भारतीय संविधान रचे जाने की दिशा में अगले कदम उठाने की बात की गई।
ब्रिटिश सरकार ने संयुक्त प्रवर समिति की सिफारिश के अनुसार भारत सरकार अधिनियम 1935 पारित किया गया। कांग्रेस के पार्श्व संगठन स्वराज पार्टी ने एम ए अंसारी की अध्यक्षता में हुई बैठक में इसे रद्द कर दिया और संविधान सभा के गठन की मांग की यह देश की ओर से पहले प्रत्यक्ष मांग थी। संयुक्त संसदीय समिति की सिफारिश को रद्द करते हुए कांग्रेस ने दिसंबर 1934 को पटना में यह मांग की, कि संविधान रचना के लिए संविधान सभा का गठन ही एकमात्र विकल्प है।
अंतरिम चुनाव, 1937 स्वतंत्रता और संविधान के संदर्भ में अति महत्वपूर्ण सिद्ध हुई। इस चुनाव में मुस्लिम लीग की हार और कांग्रेस की जीत हुई। जवाहरलाल नेहरू प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्यों में से निर्वाचित प्रतिनिधियों के द्वारा संविधान रचना के पक्षधर थे। 1938 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा की मांग को स्पष्ट रूप से रखते हुए यह कहा कि कांग्रेस स्वतंत्र और लोकतंत्रात्मक राज्य का समर्थन करती है। उसने यह प्रस्ताव किया है कि स्वतंत्र भारत का संविधान बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के ऐसी संविधान सभा द्वारा बनाया जाना चाहिए जो वयस्क मतदान के आधार पर निर्वाचित हो।
ब्रिटिश सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारंभ तक इस मांग का विरोध किया। कांग्रेस कार्य समिति ने नवंबर 1939 के अपने प्रस्ताव द्वारा यह मांग की, कि एक आजाद देश का संविधान सुनिश्चित करने के लिए संविधान सभा ही एकमात्र तरीका है। 1940 में इंग्लैंड की बहुदलीय सरकार ने पहली बार इस सिद्धांत को स्वीकार किया, कि भारत के लिए संविधान भारत के लोग ही बनाएंगे। मार्च 1942 में स्टेफोर्ड क्रिप्स को ब्रिटिश सरकार के प्रस्ताव के साथ भारत भेजा गया। यह प्रस्ताव स्वीकृत किए जाने वाले थे यदि भारत की कांग्रेस और मुस्लिम लीग उन्हें स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाते है। इस प्रस्ताव में यह कहा गया कि, पहला भारत के संविधान की रचना भारत के लोगों द्वारा निर्वाचित संविधान सभा करेगी। दूसरा, संविधान भारत को डोमिनियन स्टेट और ब्रिटिश राष्ट्र कल के बराबर ही भागीदारी देगा। तीसरा, कोई प्रांत या देशी रियासत जो संविधान को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो। ब्रिटिश सरकार उसके लिए पृथक संवैधानिक व्यवस्था करेगी। अतएव मुस्लिम लीग इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हो सके। उनकी मांग थी कि भारत को सांप्रदायिक आधार पर दो स्वतंत्र राज्य में विभाजित किया जाए और कुछ प्रान्तों को मिलाकर मुस्लिम राज्य की स्थापना किया जाए, जिसे पाकिस्तान कहा जाए और दो संविधान सभा होनी चाहिए अर्थात पाकिस्तान के लिए पृथक संविधान सभा की गठन।
संविधान की गठन को लेकर क्रिप्स के प्रस्ताव अपने ऐतिहासिक भूमिका के लिए सदैव याद की जाती रहेगी। मुंबई के ऐतिहासिक कांग्रेस अधिवेशन में 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो का नारा इसलिए बुलंद हुआ था, क्योंकि अंग्रेज़ आजादी तो दूर संविधान सभा के गठन तक में सहमति नहीं दिए।
गांधी कभी भी भारत और पाकिस्तान जैसे दो राज्यों के समर्थन में नहीं रहे, ब्रिटेन की लेबर सरकार ने सितंबर 1945 में यह घोषणा की, कि वह भारत में संविधान निर्मात्री संस्था की परिकल्पना कर रही है और उसके गठन के लिए सर्दियों में चुनाव कराए जाएंगे। एक तरफ कांग्रेस हर हाल में संविधान सभा के गठन के लिए जिद किए बैठी थी, वहीं दूसरी ओर जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने यह ठान लिया था, कि वह संविधान सभा के बहाने स्वतंत्र भारत में कांग्रेसी सत्ता किसी भी कीमत पर नहीं आने देगी भले ही भारत में ब्रिटिश राज कायम रहे।
जनवरी 1946 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में कैबिनेट मिशन को भेजा। मिशन ने पृथक संविधान सभा और मुसलमान के लिए पृथक राज्य के दावे को स्पष्ट ना मंजूर कर दिया। कैबिनेट मिशन की योजना केवल सिफारिश के रूप में थे। मिशन की यह धारणा थी कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच सहमति होकर उसे स्वीकार कर लिया जाएगा। लीग के अनुसार संविधान सभा का गठन प्रजातांत्रिक आधार पर ही अपेक्षित था किंतु वयस्क मताधिकार के अभाव में संविधान सभा को जनता की प्रतिनिधि सभा नहीं कहा जा सकता था। 16 मई 1946 को कैबिनेट मिशन की योजना को सार्वजनिक किया गया जिसके अनुसार भारत में संविधान निर्माण की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया। कैबिनेट मिशन की योजना को जिन्ना ने इसलिए स्वीकार किया क्योंकि बाद में उनमें उसे पाकिस्तान के निर्माण का स्वप्न साकार होता दिखाई दिया।
जुलाई 1946 में कांग्रेस कार्य समिति ने संविधान सभा के विचारण के लिए विषयवस्तु तय करने के उद्देश्य से कांग्रेस विशेषज्ञ समिति गठित की जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में बनी। कांग्रेस विशेषज्ञ समिति में आसफ अली, कन्हैयालाल माणक लाल मुंशी, एन गोपाल स्वामी आयंगर, कट शाह और के संथानम जैसे संविधान सभा के सदस्यों के अतिरिक्त गैर सदस्य हुमायूं कबीर और सी आर गाडगिल शामिल थे। कांग्रेस की समझ में नेहरू उसके सबसे बड़े संवैधानिक चिंतक थे। यह महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस द्वारा गठित उसे विशेषज्ञ समिति में आठ में से चार सदस्य ही कांग्रेसी थे। केबिनेट मिशन की योजना के अनुसार, जुलाई और अगस्त 1946 में संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव हुआ। औसतन 10 लाख व्यक्तियों के लिए एक प्रतिनिधि का चुनाव हुआ योजना के अनुसार, मुसलमान को 78 सिखों को चार और सामान्य वर्ग को 210 सीट आवंटित की गई। इस निर्णय के अनुसार गोपाल स्वामी आयंगर, सर्वेंट आफ इंडिया सोसाइटी के अध्यक्ष हृदयनाथ कुंजरू, वकील अदानी, कृष्ण स्वामी अय्यर, मुखर्जी और डॉक्टर राधाकृष्णन आदि शामिल थे। संविधान की प्रारूप समिति के साथ सदस्यों में केवल के एम मुंशी और टीटी कृष्णमाचारी कांग्रेस के सदस्य थे। संविधान सभा के सदस्यों को आठ प्रमुख समितियां में मनोनीत किया गया।
जिन 20 महत्वपूर्ण सांसदों ने भारत का संविधान लिखा, उनमें जवाहरलाल नेहरू सरदार पटेल डॉ राजेंद्र प्रसाद और मौलाना आजाद के अलावा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर, गोविंद बल्लभ पंत, पट्टाभि सीता रमैया, राधा स्वामी अय्यर, गोपाल स्वामी आयंगर, जयरामदास, के एम मुंशी, सत्यनारायण सिंह, अनंत शयनम अयंगर, टीटी कृष्णमाचारी, मुखर्जी, एम राव और मोहम्मद सादुल्लाह शामिल थे। इनमें एक और नाम हरि विष्णु कामथ का भी अतिरिक्त उल्लेख के साथ जोड़ा जाता है। संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार बी एन राव की संविधान रचना में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संविधान सभा में डॉ राजेंद्र प्रसाद को अध्यक्ष निर्वाचित करने के बाद जवाहरलाल नेहरू के हाथों 13 दिसंबर 1946 को संविधान की उद्देशिका का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। अक्टूबर 1947 से फरवरी 1948 तक संविधान की प्रारूप समिति इस ऐतिहासिक दस्तावेज का विषय लिखने में व्यस्त रही।
लॉर्ड माउंटबेटन ने कांग्रेस और लीग में यह स्पष्ट समझौता कराया कि पंजाब और बंगाल के समस्या वाले प्रति का विभाजन किया जाएगा, जिससे इन प्रान्तों में हिंदू और मुस्लिम बहुमत वाले खंड बनाए जाएंगे पंजाब और बंगाल प्रान्त के विभाजन का वास्तविक निर्णय इन दोनों प्रान्तों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत पर छोड़ दिया गया। इस योजना को माउंटबेटन योजना नाम दिया गया। तत्पश्चात जुलाई 1947 को गवर्नर जनरल ने पाकिस्तान के लिए पृथक संविधान सभा की स्थापना की। घोषणा की ब्रिटिश सरकार ने उक्त योजना के आधार पर भारतीय स्वतंत्रता विधयक का प्रारूप तैयार कर भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 बनाया और 18 जुलाई 1947 को इसे सम्राट की अनुमति मिल गई और जो संविधान सभा और विभाजित भारत के लिए निर्वाचित की गई थी, वहीं भारत डोमिनियन की प्रभुत्व संपन्न संविधान सभा में 14 अगस्त 1947 को पुनः कार्यरत हुई। परिणाम स्वरुप जब संविधान सभा 31 अक्टूबर 1947 को पुनः कार्यरत हुई, तो सदन की सदस्य सदस्यता घटकर 299 हो गई इनमें से 284 सदस्य 26 नवंबर 1949 को प्रत्यक्ष उपस्थित थे और उन्होंने अंतिम रूप से परित संविधान पर अपने हस्ताक्षर किए। अर्थात 16 नवंबर 1949 से लागू किए गए शेष प्रावधान के लिए संविधान 26 जनवरी 1950 को प्रवृत्त हुआ।
भारतीय संविधान की रचना का 26 नवंबर 1949 का दिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सार्वभौमिकता के उल्लास पर्व का अवसर था। यह दिन इतिहास में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के दिन के रूप में दर्ज है सभापति के रूप में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का अंतिम भाषण शिलालेख की तरह अंकित है उसे उसमें 308 निर्वाचित सदस्यों के तीन वर्षों का परिश्रम झलकता है। प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ आंबेडकर के अनुसार संविधान सभा में कुल 7635 संशोधन भेजे गए थे, जिनमें से 2473 संशोधन प्रस्तुत भी किए गए। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने यह भी बताया कि संविधान सभा की पूरी कार्यवाही में 22 नवंबर 1949 तक 6396729 रुपए खर्च हुए थे। सभापति के अनुसार इस अवधि में लगभग 55000 दर्शकों को दर्शक दीर्घा में आने की अनुमति दी गई।
कनक तिवारी का संवैधानिक चिंतन:
भारतीय संविधान, विष्व के सबसे विस्तृत और विविधतापूर्ण संविधानों में से एक है। इसके निर्माण में अनेक विचारधाराओं, सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों और सामाजिक आवश्यकताओं का समावेश किया गया है। कनक तिवारी का मानना है कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की आत्मा और उसकी विविधताओं का प्रतिबिंब है।
कनक तिवारी के अनुसार, भारतीय संविधान स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने कहा, “भारत का संविधान स्वतंत्रता आंदोलन की प्राप्ति है। आज हमारा संविधान राजपथ बन गया है, इसे जनपथ बनाने की जरूरत है।“ यह उद्धरण स्पष्ट करता है कि तिवारी संविधान को जनता के लिए, जनता द्वारा और जनता के हित में मानते हैं।
तिवारी का मानना है कि भारतीय लोकतंत्र और संविधान की मूल प्रेरणा में जवाहरलाल नेहरू और डॉ. अंबेडकर की संयुक्त भागीदारी रही है। उन्होंने लिखा, “भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक समझ की मूल प्रेरणा में जवाहरलाल नेहरू और डॉ. अंबेडकर की मोटे तौर पर केन्द्रीय संयुक्त भागीदारी रही है।“ यह दृष्टिकोण संविधान निर्माण में विभिन्न विचारधाराओं के समन्वय को दर्शाता है। कनक तिवारी ने संविधान पर हो रहे समकालीन हमलों की भी आलोचना की है। उन्होंने एक लेख में लिखा, “योजनाबद्ध तरीके से भारतीय संविधान के प्रति एक घृणित अपराध करने का कुत्सित प्रयास किया गया था।“ यह उद्धरण संविधान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और उसकी रक्षा के लिए उनके संघर्ष को दर्शाता है।
तिवारी ने आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान की भूमिका पर भी प्रकाश डाला है। उन्होंने लिखा, “आदिवासी जीवन की जरूरतें लूट के लिए विकसित बाजारतंत्र के अर्थशास्त्र पर निर्भर नहीं हैं।“ यह दृष्टिकोण संविधान के सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। तिवारी ने गांधी के समाजवादी दृष्टिकोण को संविधान के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना है। उन्होंने लिखा, “गांधी पूंजीवाद तथा निजीकरण के अंधसमर्थक नहीं थे। उनके विचार दर्शन में बड़ी सामाजिक आवश्यकताओं के सिलसिले में कई सेवाओं के राष्ट्रीयकरण का आग्रह था।“ यह दृष्टिकोण संविधान के सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
कनक तिवारी का संविधान निर्माण पर चिंतन एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो कानूनी, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को समाहित करता है। उनका विचार है कि संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि यह भारतीय समाज की आत्मा है, जिसे संरक्षित और संवर्धित किया जाना चाहिए।
संदर्भ सूची
1. तिवारी कनक, ’संविधान का सच’, आधार प्रकाशन, 2002
2. तिवारी कनक, ’संविधान की पड़ताल’, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2015
3. तिवारी कनक, ’संविधान और हम भारत के लोग’, सूर्य प्रकाशन, बीकानेर, 2021
4. तिवारी कनक, ’संविधान की हालत’, प्रलेख प्रकाशन, दिल्ली, 2024
5. तिवारी कनक, ’संविधान एक शिनाख्त’, सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, दिल्ली, 2024
6. तिवारी कनक, ’यह देश किसका हैं?’, सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर, 2021
7. https://bastariyaadivasi.xyz/2022/07/maaveshee-lokatantr-laie-na-kanak-tivaaree.
8. https://www.jagran.com/haryana/kurukshetra-haryana-srijan-utsav-starts-in-saini-samaj-bhawankurukshetra-20112157.
9. https://www.positiveindia.net.in/sawaliya-irado-ki-gulabi-pustak
10. https://www.positiveindia.net.in/yeh-rituraj-ka-grishamkaal-by-kanak-tiwari
11. https://lalluram.com/learn-from-the-pen-of-kanak-tiwari-the-famous-advocate-messiah-of-bastar
12. https://vagartha.bharatiyabhashaparishad.org/kanak-june24
13. https://www.bhaskar.com/local/uttar-pradesh/kanpur/news/samvidhan-sabha-kanpur-news-kanpur-10-gems-of-up-were-involved-in-the-making-of-the-constitution-132499583.html?utm_source=chatgpt.com
14. https://cgkhabar.com/attack-on-indian-constitution-20240521
15. https://www.dailychhattisgarh.com/latest-news/85330/daily-chhattisgarh
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17. https://www.editorjee.com/gandhi-congress-and-public-servants-union-kanak-tiwari
18. https://agnialok.com/the-book-written-by-kanak-tiwari-is-the-story-of-tribal-neglect-from-the-british-rule-to-the-21st-century
19. https://vssraghuvanshi.blogspot.com/2022/07/8.html
20. https://janchowk.com/challenges-before-congress-and-its-leaders
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Received on 26.05.2025 Revised on 18.07.2025 Accepted on 10.08.2025 Published on 22.08.2025 Available online from September 05, 2025 Int. J. Ad. Social Sciences. 2025; 13(3):141-148. DOI: 10.52711/2454-2679.2025.00022 ©A and V Publications All right reserved
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